मंगलवार, 26 अगस्त 2014

आशा और निराशा

आशा और निराशा दोनों ही परस्पर विरोधी शब्द शब्द हैं।

आशा ही जीवन है,
आशा ही संयम है,
आशा ही एक धन है,
आशा ही संगम है।

आशा ही पावन है,
आशा ही पतझड़ है,
आशा ही वर्षाऋतु,
आशा ही सावन है,
{___ अंगिरा प्रसाद मौर्या ___}

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और जब निराशा प्रवेश कर जाती है तब कुछ नहीं रहता ! कुछ नहीं रह जाता! बचता है चंचल मन, और वह कब किस दिशा में जा सकता है उसका कोई सिद्धांत नहीं होता। क्योंकि जब आशाएँ क्षीण हो जाती हैं तब व्यक्ति का अस्तित्व और व्यक्तित्व दोनों साथ छोड़ देता है।

जब अस्तित्व ही नहीं रहता तब व्यथित हो जाने की प्रक्रिया बहुत तीव्र हो जाती है। जैसे बिना किसी नियत केंद्रबिंदु के केवल नियत त्रिज्या के सहयोग से कोई भी गोलाकार आकृति नहीं खींची जा सकती ।

अतः यदि आप आशा करते हैं तो आपकी आशा के पीछे कोई न कोई आशय अवश्य होता है, परन्तु यदि वह शीघ्र पूरी न हो तो निराश न हों ! उस पर दृढ़ रहिए, थोड़ा और प्रयास कीजिये, थोड़ी और प्रतीक्षा कीजिये आपकी आशाएँ पूर्ण होंगी।

परन्तु भग्न अथवा निराश हो जाने से आपका लक्ष्य तो हो सकता है किन्तु केंद्रबिंदु फिसल अथवा खिसक जाता है। और ऐसी अवस्था में आपको सफलता कभी नहीं मिल पाती।

आपका शुभचिन्तक - अंगिरा प्रसाद मौर्या।
Www.indiasebharat.blogspot.com पर सर्वाधिकार संकलित।

-: पढ़ना अनिवार्य है :-
यहाँ पर मोदीराज से मोहभंग के विषय में कोई तत्व नहीं जोड़े गए है। मोदीजी के नौधुआ विरोधी कृपया अन्यथा लेने का प्रयास न करें।
।। जनहित में जारी।।

!!*!! वन्दे-मातरम् !!*!!

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