गुरुवार, 19 जून 2014

उठो हे वसुधा के रखवालों

उठो हे वसुधा के रखवालों,
जगो हिन्द के रहने वालों,
चलो यहाँ फिर दीप जला दो,
सब कलुशों को अभी मिटा दो।

आपस में तुम ना टकराओ,
कटुताओं को अभी भगाओ,
भारत विश्व-विजय लहराओ,
हिन्द विश्व का हृदय बताओ।

काम-क्रोध निरलिप्त बना दो,
सदाचार की लिपि लहरा दो,
वेस्ट-सभ्यता को ठुकरा दो,
सब कलुशों को अभी मिटा दो।

नेताओं को मात दिला दो,
ग्राम-ग्राम में फूल खिला दो,
असहाय यहाँ पर नहीं है कोई,
वोट-बैंक को तुम सिखला दो।

~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या

वन्दे-मातरम्

सूर्य-पताका मेरा निशान है

सूर्य-पताका मेरा निशान है,
भगवा मेरा पहचान है,
दुनियाँ का केंद्रबिन्दू हूँ,
मैं हिन्दू हूँ, मैं हिन्दू हूँ ।

बुधवार, 18 जून 2014

खूब बढ़ा है हमारा शिक्षा स्तर

आज के इस युग लगभग 90% युवा साक्षर हैं, लोग कह रहे हैं शिक्षा का स्तर बढ़ गया है।

लेकिन क्या सचमुच बढ़ गया है ?

अरे शिक्षा स्तर के निर्माताओं आप ये क्यूँ नहीं कहते कि कुशिक्षा का स्तर बढ़ा है। आज स्कूलों में विज्ञान की शक्त पढाई होती है, गणित की सक्त पढाई होती है, अंग्रेजी की शक्त पढाई होती है।
लेकिन नैतिक शिक्षा ?????
इसका तो जैसे कोई महत्व ही नहीं रहा। कहने को तो सभी स्कूल और विद्यालय भारतीय हैं ! लेकिन वहाँ पर नैतिक शिक्षा जैसे विषय को मानों लकवा मार गया हो।

आखिर कोई क्यों पढ़ेगा नैतिक शिक्षा उसकी डिग्री किसी नौकरी के लिए आवश्यक भी तो नहीं है। अगर कोई आज के युवकों से नैतिक शिक्षा के विषय के बारे में पूँछ ले तो शायद कितने ऐसे होंगे जिनको ये बहुत नया लगेगा ! वे तो यही कहेंगे कि यह क्या है ?

और यदि विषय दिए भी जाते हैं तो उस पर पढाई नहीं होती और ऐसे विषयों के लिए कोई कड़ाई नहीं होती, बस पुस्तकों की सूची में सिर्फ नाम दर्ज करवा दिया जाता है।

आखिर हमें नीतियों की जरूरत भी कहाँ है जो की आने वाली पीढ़ियों को बताया जाय सिखाया जाय !
हमें तो इन नीतियों का गुलाम बना के इनका पालन करवा दिया जायेगा।
चौरस्ते पर सिग्नल होगा तो दुर्घटना नहीं होगी, वहाँ एक हबलदार होगा जो न जानने वाले को दंड देकर अर्थात कुछ खजाना लेकर हमें नीतियों से परिचित कराएगा।
चप्पे चप्पे पर पुलिस चौकी होगी, जो अपराधियों को दंड देकर यह बताएगी कि क्या करना चाहिए क्या नहीं।
सब जगह अदालत होगी जो अपराधी और निरपराधी का निर्णय करेगी।

क्या हमारे बच्चों में सदविचार, प्रेरणा और बौद्धिक क्षमता के बिना ये सब बनाये गए जाल काफी हैं, क्या बिना बुद्धि के विद्याओं अथवा बल का सदुपयोग हो सकता है ?

कदापि नहीं !

लोग गणित अंग्रेजी और विज्ञान में सौ नहीं लाखों अंक प्राप्त कर लें ! लेकिन बिना नैतिक शिक्षा में सौ अंक प्राप्त किये, ये दुर्घटनाएँ, ये अपराध और बलात्कार जैसा घिनौना अपराध थमने वाला नहीं।

आपका शुभचिन्तक___ अंगिरा प्रसाद मौर्या

!!*!! वन्दे-मातरम् !!*!!

मंगलवार, 17 जून 2014

हमारा सामाजिक चिंतन

आज इस बात को कौन नहीं स्वीकार करेगा की हमारा भविष्य खतरे में है ?

लगभग सभी स्वीकार कर लेंगे !

लेकिन इससे निजात कैसे पाया जाय इस पर किसी के पास विचार करने का समय ही नहीं है। जहाँ तक मैं देख रहा हूँ, यहाँ पर बच्चों को तो छोड़ ही दो, हमारे समाज के श्रेष्ठ लोग भी अनावश्यक कार्यों में लिप्त हैं।

इनका फिल्मों का बखान करना, क्रिकेट मैचों का बखान करना, मामूली नहीं है। आज का क्रिकेट मैच अथवा खेल संसार व्यापर में व्याप्त है। और इसी तरह समाज का दर्पण दिखाने वाला फिल्म जगत भी आज एक व्यापारी हो चुका है।

ऐसे में हमें इनके वृत्ति पर नहीं अपितु प्रवृत्ति पर ध्यान देने की विशेष आवश्यकता है। लेकिन नहीं, आज के लोगों के लिए प्रवृत्ति नहीं वृत्ति ज्यादा दिलचस्प हो गई है, फिर चाहे वो कैसी भी हो !

हमें आज इनसब को फालतू कहने की आवश्यकता है, हमारे बच्चों का तेजी से इनसब चीजों पर ध्यानाकर्ष्ण हो रहा है, तो इसके लिए सर्वप्रथम हम लोग ही जिम्मेदार हैं, जब हम्हीं इनसब के शिकार रहेंगे तो हमारे बच्चे क्यूँ नहीं।

जरूरत है सभी श्रेष्ठों को एकजुट होकर ज्ञानगंगा में लिप्त होने की, जरूरत है नई पीढ़ी को नव-ओज की घिनौने खोज की नहीं।

हर व्यक्ति को हमारे महापुरुषों का अनुशरण करना चाहिए, उनके जैसा आचरण करना चाहिए, उनके गुणों का बखान करना चाहिए, गुणगान करना चाहिए। क्योंकि आप नई पीढ़ी को जैसी छाया प्रदान करेंगे वैसी ही उसकी प्रवृत्ति होगी। क्योंकि प्रवृत्ति का आशय भी छाया ही है।

शायद हमारी ये बातें भले ही बहुतों को नकारात्मक लग सकती हैं लेकिन बुद्धिजिविवों के लिए ये सदा ही सकारात्मक और सार्थक बातें ही होंगी, इसपर हमारा कोई शक नहीं है।
!!*!! वन्दे-मातरम् !!*!!

सोमवार, 16 जून 2014

चमड़ी के चक्कर मेँ दर्द ?

*********अब मौत
की तलाश*********** ?
***********दोस्तो इनकी कहानी मैने
पड़ी ,कहानी मेँ दर्द है किन्तु दर्द का करण
कौन ? दोस्त जिस दिन इन्सान पैदा हुआ
उसी दिन प्यार भी पैदा हुआ |"प्यार
दो आत्माओ का मिलन है" लेकिन हम प्यार
का अर्थ जानते हुऐ या फिर अंजान बन कर अर्थ
का अनर्थ कर देते है|तो फिर प्यार क्या है
श्रीमान जी, "प्यार" एक दिल से उठने
वाली संवेदना या भावना है |और माता-पिता,
भाई-बहन ,पत्नी ,बच्चे, मित्र आदि "रिश्ते" है|
रिश्तो के बिच मिठी- मिठी बातेँ करना ,हँसना-
हँसाना, रुलाना,हाथो से सहलाना,चुमना, गले
या सिने से लगाना आदि| की जाने
वाली संवेदनाओ,भावनाओ और व्यवहार
को "प्यार" कहते हैँ| अत: जिवन मेँ "रिश्ता"
रुपी "गाड़ी" चलाने| "प्यार" रुपी "पेट्रोल"
अति आवश्यक है| वर्ना दोनो अधुरे है | एक और
संवेदना , जिसे मैथुन ,सैक्स या संम्भोग कहते हैँ|
ये केवल एक ही रिश्ते पत्नि के लिए बना है|
किन्तु किसी लड़के लड़कि के बिच आकर्षण बड़े
तो इसे प्यार कहते हैँ किन्तु ये आकर्षण सम्भोग
के लिए बनता है समाज मेँ ऐसे कार्य वर्जित हैँ |
यदि किसी लड़के लड़कि से प्यार हो तो पिछे
बताऐ गये प्यार के प्रति वो भावनाऐँ
होनी चाहिए न की संम्भोग यदि संम्भोग
आवश्यक है तो सामाजिक रीतिरिवाजो के साथ
पहले विवाह होना आवश्यक है किन्तु विवाह मेँ
भी दर्द होता है| दिल टुटतेँ हैँ| पर इसे सामाजिक
मान्यता है इसमेँ ऐसा नही की आज प्यार
किया संम्भोग किया और कल छोड़ दिया |कुछ
नियम कानुन बनाये गये हैँ और विवाह को अटुट
बँधन भी माना गया है| अत: किसी लड़के
लड़की के बिच प्यार हो उन्हेँ आत्मिक प्यार हो,
शारीरिक प्यार नहीँ यदि संभोग आवश्यक है,
तो पहले विवाह होना चाहिए |वर्ना चमड़ी के
चक्कर मेँ दर्द तो भोगना ही पढ़ेगा ?
धन्यवाद....| —
~~~~~~> मनीष गौतम "मनु"

बलात्कार से निजात पाने का बहुत ही ठोस एवं समाजोपयोगी हमारा प्रयास कुछ इस प्रकार है

कुछ समय पहले बलात्कार जैसे शब्द सार्वजनिक अर्थात आम कर दिए गए, इसका सर्वाधिक श्रेय फिल्मो को जाता है।

और यदि आज बलात्कार जैसी घटनाएँ आम हो गयीं तो इसका सर्वाधिक श्रेय फिल्मों सहित भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड को भी जाता है।ज

अब सवाल यह उठता है कि सर्वाधिक श्रेय इन्हीं को कैसे जाता है ?

तो बहुत सीधा सा उदहारण है, नए फैसन/अभद्र पहनावों का सर्वाधिक प्रचार फ़िल्में ही करती हैं।

बलात्कार क्या है कैसे किया जाता है अथवा कैसे होता है, इसका सचित्र वर्णन भी फिल्मे ही करती हैं।

फ़िल्में किसी भी कहानी को कहानी के रूप में ना रखकर आजकल गन्दी सीनों के प्रयोग से कि एक पुरुष किसी स्त्री के प्रति कैसे भावुक होता है, इसका सचित्र सन्देश पहुचाती हैं।

फिल्म सेंसर बोर्ड इसके लिए गुनाहगार है क्योंकि वह ऐसी भी फिल्मों को सत्यापित करता है, जिसका समाज पर कुप्रभाव पड़ सकता है।

एक सीधी सी बात है कि कोई भी विवाहित स्त्री-पुरुष अपने शयन कक्ष में क्या करते हैं यह प्रत्येक को पता है, और विवाहित अथवा विवाहिता का यह कर्म, कर्तव्य एवं अधिकार भी है।
लेकिन यही विवाहित अथवा विवाहिता अपना वह कर्म, कर्तव्य एवं अधिकार सरेआम बाज़ार में अथवा चौराहे पर नहीं करते क्योंकि उनपर अथवा प्रत्येक पर सामाजिक प्रतिबन्ध होता है, लेकिन फिल्मों में ऐसा नहीं है।
फिल्मों में तो आजकल शयनकक्ष के कार्यकलापों सचित्र सार्वजनिक कर दिया गया है।

इनसब बातों को सोचकर हमारा हृदय यह प्रश्न करता है कि ऐसे घिनौने कृत्यों पर भारतीय कानून आखिर क्यों नहीं रोक लगाती ?
क्या हमारा कानून इनसब के हाथों बिक चुका है?
क्या हमारी भारत-निति का संचालन इन फिल्मों के अधीन है?

इस समय फिल्म "हेट स्टोरी टू" चर्चे में आयी है, youtube पर हमने इसका ट्रेलर भी देखा।
हमारे समाज के लिए यह बहुत ही आपत्तिजनक सिद्ध होगी ऐसा हमारा अनुमान है।

यदि सेंसर बोर्ड ने इसे हरी झंडी दिखाई तो सिनेमाघरों में यह जरूर आएगी।
हमने तो आजतक शायद ही कोई फिल्म पूरी अथवा सजग होकर देखी हो, परन्तु इस फिल्म को हम जरूर देखेंगे।
और
यदि आवश्यकता हुई तो हम इन सबका बहिष्कार करने हेतु एक नई पार्टी का गठन अवश्य करेंगे।
~~~~~~~~~ आपका शुभचिन्तक अंगिरा प्रसाद मौर्या।
!!*!! वन्दे - मातरम् !!*!!

शुक्रवार, 13 जून 2014

नीति

जो अनीति को भी नीति कहे उसे पाकिस्थान कहते
है .! जो चोट खा के भी प्यार करे उसे हिन्दुस्तान
कहते है.! पर ऐसा कब तक कहते जाओगे..!
जुल्मो को सहते जाओगे..! इस प्रिती को कहो पराई.!
अब नापाक 'पाक' को औकात दिखाने की बारी आई..!
निकल गया है सुरज ..! बिखर गई है आभा ..! उगते
सुरज से पायेँ उर्जा..! हो जायेँ तरोताजा..!!
(((((((((( सु-प्रभात )))))))))
******मित्रवर********
आपका दिवस मंगलमय हो ..

हमें हिदुस्तान को विश्व-गुरु बनाना है तो धैर्य की विशेष आवश्यकता है

किंचिद धैर्य नहीं खोना है,
कटुताओं के तूफानों में, 
कोलाहल भी खूब मची हो,
स्थिति के ही ऊफानों में।।
किंचिद धैर्य नहीं खोना है,
कटुताओं की तूफानों में।।

पल आया वो बीत जायेगा,
हारा बंदा जीत जायेगा,
करुण करेंगे व्यक्ति वही तब,
अपने अपने ही "मानों" में।।किंचिद.............तूफानों में।।

यथा-व्यथा के वेग मात्र से,
हैं रुक जाते साधारण "पंछी",
व्यक्ति साहसी को तुम देखो,
नगण्य समय है उत्थानो में।।किंचिद...............तूफानों में।।

चाहत की बस लहर चाहिए,
साहस का इक कहर चाहिए,
आशा की बस नहर चाहिए,
मिलेंगे अपने वीरानों में।। किंचिद................तूफानों में।।
>>>>>>>वन्दे-मातरम<<<<<<<
~~~~~~~Angira Prasad Maurya
दिनांक:- २९/११/२०१३

मानों=जिस मान के कारण लोगों को अहंकार या घमंड होता है।
पंछी,= पक्षी, अर्थात पंख वाला प्राणी।

यथा-व्यथा=आज इस कलयुग की जो स्थिति है।

पंछी का का संबोधन उस व्यक्ति के लिए दिया गया है जिनको बिना बुरे समय का सामना किये ही अच्छे दिन प्राप्त हों।
https://www.facebook.com/apmjsk/posts/551977334891366?stream_ref=5

सभी हिन्दी बोलने, पढ़ने एवं लिखने वालों को हिन्दी-दिवस पर साभार/-

हिन्दी मेरी भाषा है,
नहीं और से आशा है,
एक तिनका अपवाद नहीं है,
रंग हजारों रूप वही है।

रस चाहे जितना तुम लेलो,
शब्दों की बगिया में खेलो,
जीत बड़ी है जहाँ में हिंदी,
मिले नहीं इसको प्रतिद्वंदी।

शोभा सी यह सजी हुई है,
सूरज जैसी शीघ्र रही है,
परिचय इसका बहुत है लम्बा,
नहीं बीच में आता खम्बा।

"मौर्य" प्रतिष्ठा की सहकर्मी,
जननी है तूँ नहीं है जन्मी,
हम तोहे परनाम करत हैं,
भारत तोहे शान बसत हैं।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक___ १३/०६/२०१४
*******
!!*!! जय हिन्द !!*!!
!*! वन्दे-मातरम !*!