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रविवार, 20 दिसंबर 2015

भारत के विकाश में बॉलीवुड एक विशेष रोड़ा

आज जब प्रत्येक देश आतंकवाद से लड़ने की तैयारी में हैं तब हमारे देश का बॉलीवुड लोगों को गुमराह और इतिहास से छेड़छाड़ में लगा है।

१. फिल्मों का इस प्रकार प्रचार जैसे फ़िल्म ही हमारे देश के सुरक्षा की परिपाटी हो।

२. देश के पैसे व्यर्थ में लगाकर देश के युवाओं का समय व्यर्थ करने की साजिस

३. एक ऐसा उद्योग जो अपने देश का धन स्वयं लूटने का कार्य करता है।

सार्थक विश्लेषण :-

आज बॉलीवुड के पास जितनी भी संपत्ति है यदि वही संपत्ति किसानी में भी लगा दी जाय तब भी भारत के अनेक युवाओं को रोजगार मिलेगा और समयव्यर्थ की सम्भावनाएं कम होंगी।

आज फिल्मों का प्रचार इतना हो गया है कि लोग अपने उद्योग धंधे छोड़कर फ़िल्म देखने पर विवश हो गए हैं क्योंकि हमारे देश की पत्रकारिता भी आज इन फिल्मों के अधीन हो गयी है और ऐसा होना शुभ संकेत नहीं है।

पहले नेताओं के चलते युवाओं में मतभेद था और दंगे होते थे और आज तथाकथित नचनियों के चलते युवाओं में मतभेद है और दंगे हो रहे हैं। ऐसा तब सम्भव हो पाया है जब हमारे देश की मीडिया का 50% ध्यान इन नचनियों पर ही रहता है। यह भी देश के लिए बहुत ही अशुभ संकेत है।

इस पर कितना भी विश्लेषण कर लिया जाय !
अंततः निष्कर्ष यही निकलेगा कि फिल्मो से और देश के युवाओं से मात्र इतना संबंध है कि बॉलीवुड को लाभ होगा और देश के युवाओं को हानि ।

देश के युवाओं का नुकसान अर्थात् देश का 75% नुकसान।

ऐसे में हमारे देश के युवा तथा बुद्धिजीवियों के मन ये विचार क्यूँ नहीं प्रवेश कर पाते यह एक बड़ा प्रश्न है,
इस प्रश्न के उत्तर हेतु मैं आपके विचारों को सादर आमंत्रित करता हूँ !

#वन्दे_मातरम् - अंगिरा प्रसाद मौर्य।
#बॉयकाट_बॉलीवुड ,

सोमवार, 1 सितंबर 2014

काल्पनिक और आधुनिक

काल्पनिक और आधुनिक में बहुत अंतर होता है और आज भी है ।

आधुनिक युग में जिस प्रकार विज्ञान कार्यरत है और अंतर्राष्ट्रीय माँग को देखते हुए हम यही कह सकते हैं कि आधुनिक विज्ञान आगे है और इसने बहुत बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। विज्ञान नित्य उन्नत हो रहा है और नित्य उन्नत रहेगा ऐसा पूरा विश्व मानता है।

किन्तु काल्पनिक युग के समर्थक चंद भारतीय पंडितों के पांडित्य(पाखंड) की मानें तो इनका काल्पनिक युग आज के युग से श्रेष्ठ था। तब का विज्ञान अधिक उन्नत था। आज विज्ञान का पतन हो गया है ऐसा पंडितों का मत रहा है।

किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं है । ज्ञान और विज्ञान ऐसी वस्तुएँ एवं इनमे ऐसे तत्वों का समावेश है कि ये सदैव उन्न ही रहते हैं। "जिस प्रकार प्रजनन से जनसंख्या वृद्धि होती रहती है उसी प्रकार नए नए व्यक्तियों के नए नए अभिव्यक्ति एवं व्यक्तित्वों के योग से ज्ञान विज्ञान की वृद्धि भी निश्चित है" यह तथ्य है।

परन्तु पंडितों की मानें तो ज्ञान और विज्ञान का नित्य पतन होता है। इनकी मान्यताओं और व्याख्याओं की मानें तो पहले के जितने पंडित थे वे अबतक सूद्र हो जाने चाहिए थे नहीं तो इनके द्वारा उपजी और उपजायी सारी मान्यताएँ निराधार हैं।

हमारा भारत बहुत पीछे गया था अभी तक बहुत सी विकृति हुई है तो इसके एक एव कारण भारतीय पंडित ही हैं।
यही वो पंडित हैं जिन्हें अपने पूर्वजों परशुराम आदि के मिथ्या मान्यताओं पर गर्व है।

यही वो पंडित हैं जिन्होंने सती-प्रथा का प्रतिपादन किया था(पुरुष का मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी को आभुषणयुक्त करवा के जीवित अवस्था में मृत पति के साथ फूँक देना, और मध्य रात्री में जाकर सभी आभूषणों को श्मसान की राख से ले आना इत्यादि )।

यही वो पंडित हैं जिनके चलते आज देवनागरी भाषा का लुप्त हो जाना सम्भव है ( चंद इस्लामिकों ने उर्दू का इतना प्रसार किया कि आज पंडित वर्ग भी उर्दू शब्दों के प्रयोग हेतु बाध्य है। और यही पंडित समाज को सिद्धांत भी बताते हैं )

यही वो पंडित हैं जिनके ढोंगों के चलते ब्राह्मण वर्ग के उपरांत सभी इनसे घृणा का भाव रखते हैं।

भारत में अंग्रेज आये थे तो भगवान को बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ !
अंग्रेज न आये होते तो एक नई क्रांति का जन्म नहीं हुआ होता और आज भी भारत पर इन तुच्छ पंडितों का शासन होता। पूरा समाज प्रताड़ित होता।

आज की ही स्थिति देखलीजिये ! आज भी समाज कहीं न कहीं पर अंधविश्वासों में ही जी रहा है। जैसे विवाह के समय पंडित ही मंत्रोच्चारण करेगा तभी विवाह संपन्न होगा।

कैसी व्यवस्था है ?
जब मंत्रोच्चारण से ही विवाह संपन्न हो जाता है तो उसमे जाति पाति से क्या लेना ! कोई भी मन्त्र पढ़े और विवाह संपन्न हो जायेगा। शब्दों की कोई जाति तो होती नहीं है कि फला जाति का व्यक्ति ही फला शब्द बोल पायेगा।
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क्रमशः
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WWW.indiasebharat.blogspot.com
भारतीय शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्या।
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!!*!! वन्दे- मातरम !!*!!
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रविवार, 13 जुलाई 2014

-:महिलाओं का अधिकार:-

लोग कहते हैं महिलाओं को अधिकार नहीं मिल रहा है उनको भी अधिकार मिलना चाहिए।
"
किन्तु मैं कहता हूँ कि पुरुषों को उनका अधिकार नहीं मिल रहा है उन्हें क्यूँ इस अधिकार से वंचित रखा जाता है।
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महिलाओं को अधिकार मिलना चाहिए, जब यह बात कोई पुरुष अथवा राजनेता कहता है तो निश्चय ही समझ लेना चाहिए की वह लोक-लुभावानता के लिए ही कहता है अथवा स्वयं को पूज्य बताने हेतु ही कहता है, अब इनसे आप सदैव ही बचेंगे ऐसी हम अपेक्षा रखते हैं।

वास्तव में महिलाओं का अधिकार वही चाहता है जो सबसे पहले महिलाओं का सम्मान करता है तथा अपने परिवार में और समाज में उनको अधिकार देने के लिए नतमस्तक हो। लच्छेदार बातों से तो व्यापार ही होता है प्यार कभी नहीं हो सकता।
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कल रविवार था। यह कल की ही बात है। मैं मुंबई के उपनगरीय मार्ग पश्चिम रेलवे की सामान्य रेल से यात्रा कर रहा था। यात्रा के दौरान मैंने देखा कि सामान्य डब्बे में जिसमे मैं बैठा हुआ था उसी में एक बहुत बड़ा परिवार सवार हुआ जबकि उसमे भीड़ इतनी थी कि यदि मैं उस समय उस रेल स्थानक अथवा ठिकाने पर होता तो मैं अकेला होते हुए भी उस रेल को कदापि न पकड़ता। और यहाँ की उपनगरीय रेल में महिलाओं के लिए भी अलग से डब्बे होते है। कुछ रेल तो केवल महिलाओं के लिए ही होते हैं उसमे पुरुषों का जाना वर्जित होता है।

लेकिन वह पूरा का पूरा परिवार उसी भीड़ में ही चढ़ा। उसमे चार युवतियाँ और एक औरत, दो अधेड़ तथा एक युवक शामिल थे। सब के सब महिलाएँ अभद्र अथवा पश्चिमी वस्त्र पहनी थी। उनमे जो औरत अथवा उनसब की माँ थी वो सबसे अभद्र वस्त्रों को धारण किये हुए थी।

एक दूसरे को रगड़ते-रगड़ते वे लोग मेरे पास ही आ पहुंचे। तब तक मेरे किनारे से एक युवक उठ पड़ा और एक युवती पास में बैठी। मैं भी खड़ा हो जाता यदि उस रेल में महिला-विशेष डब्बा ना होता तो।
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अब जरा सोचिये !
उन महिलाओं की रगड़ से कुछ को आनंद आया होगा और कुछ को आश्चर्य हुआ होगा और कुछ को परेशानी। परेशानी उसको ही हुई होगी जो महिलाओं की सत्ता को मानता होगा और वास्तव में उसके घर में महिलाएँ होंगी तथा वह महिलाओं से वात्सल्य भाव रखता होगा।

किन्तु इस पर ध्यान देने के लिए कोई भी राजनेता आगे नहीं आयेंगे और यदि कोई एक आगे आता भी है तो दस मिलकर उसे गलत बताने को तुरंत तैयार हो जायेंगे।

ऐसे में लोग कहते हैं की बलात्कार की संख्या बढ़ी है यह पूरे समाज को शर्मशार कर रही है। क्या उस परिवार के युवक ये नहीं बता सकते थे कि महिलाओं को उनके डब्बे में ही बैठना चाहिए। और यदि वे पुरुष महिलाओं का आदर करते थे तो क्या महिलाओं को नहीं यह सूझना चाहिए कि उन्हें उचित डब्बे में ही सवार होना चाहिए। लेकिन नहीं ! यदि वह ऐसा कर देंगी तो उन्हें यह कैसे ज्ञात होगा कि उनके प्रति कितने लोग आकर्षित होते हैं।
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यहाँ पर तो रेलवे में ही नहीं अपितु परिवहनों(बसों) में भी महिला विशेष बैठक होता है। ऐसे में महिलाओं को सामान्य बैठक पर बैठना कितना उचित है ? और यदि पुरुष उनकी बैठक पर बैठते हैं तो उनको खड़ा कर देना कितना उचित है? रेल में सामान्य डब्बों में महिलाओं को वर्जित क्यों नहीं किया जाता ?
क्योंकि यदि ऐसा होगा तो महिलाओं के प्रति शोषण और बलात्कार जैसी भावनाओं का जन्म/उदय कैसे होगा ?
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ऐसे में तो हमारा एक ही सुझाव है कि अब महिलाओं को अपने अधिकार हेतु नहीं अपितु पुरुषों के अधिकार हेतु लड़ने की आवश्यकता है अथवा लड़ना चाहिए। नारी का भी कोई अस्तित्व है यह बताना चाहिए। आखिर कब तक पुरुषों के उपकार में दबी रहेंगी। कब तक श्रीमती लिख के उनका नाम उड़ा के किसी और का नाम लिखा जायेगा।
वैसे जहाँ तक अस्तित्व की बात है इसपर किसी अगले लेख में बात करेंगे !

  !!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

        ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।

शुक्रवार, 27 जून 2014

कांग्रेस कार्यकर्ता भी जुटे अराजकता फ़ैलाने में,

कल ही जालंधर में कांगेरस कार्यकर्ताओं ने रेल किराये की बढ़ोत्तरी को लेकर सिटी रेलवे स्टेशन पर रेल ही रोक दिया, और श्री मोदी जी का पुतला भी जलाया। जबकि इससे पहले पुतला जलाने को लेकर लखनऊ में एक बार दंगा हो चुका है। लेकिन फिर भी इनके कदम रुकने की ओर नहीं।
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वहाँ के कांग्रेसियों का कहना है कि जब उनकी सरकार ने रेल भाड़ा बढ़ाया था तो भाजपा ने अलोकतांत्रिक बताया था। तो अब वही सत्ता में आकर अलोकतांत्रिक कार्य क्यों कर रही है।

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अरे भैया !! भाजपा वालों ने दंगा फ़ैलाने हेतु पुतला तो नहीं जलाया था ना !
अब जनता इतनी भोली नहीं रही जितना की आपलोग समझते आये हो। क्या ये सब बताने से जनता कोयला घोटाले और 2G घोटाले भुला देगी ? कदापि नहीं।  बहुत पहाड़ा पढ़ाये अबतक।
और इन घोटालों से हुए नुकसान की भरपायी कहाँ से होगी ? क्या पुतला फूँकने से हो जायेगा ? या फिर रेल मार्गों को अस्त-व्यस्त करने से होगा !
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!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!
       
                ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

सोमवार, 23 जून 2014

जय हिन्द

एक बहुत ही सुखदायक समाचार में आपका स्वागत है !
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जहाँ सीमा पर तैनात हमारे सैनिकों के खुद के पास हथियारों और अश्त्रों की पूरी आपूर्ति नहीं हो पाती थी, वहीँ अब हमारे सभी सैनिक अस्त्रों सस्त्रो से सजे भी होंगे और हमारा भारत किफायती दामों में अस्त्रों सस्त्रों का निर्यात भी करेगा।
अब चीन तो क्या कोई भी देश हमारे भारत को टक्कर नहीं दे पायेगा।

ये आज चीन के लिए दुखदायक और भारत के लिए सुखदायक समाचार है।

हमारी सरकार पाकिस्तान के भी इलाज पर कार्यरत है।

!!*!! वन्दे-मातरम् !!*!!

शनिवार, 21 जून 2014

श्री प्रधानमंत्री जी की सोच और हमारा दृष्टिकोण

मैं श्री मोदी जी के अमूल्य विचार/निर्देश से पूर्ण सहमत हूँ की योजनाओं के नाम बदलने मात्र से योजनाएँ सफल नहीं हो जाती अपितु सत्ता पक्ष उसका क्रियान्वित कैसे करता है ये मायने रखता है।
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किसी जगह अथवा विशेष स्थल का नाम वहाँ के स्थानीय पुजनीयों के नाम से ही होने चाहिए, किसी पार्टी विशेष के पीढ़ियों से नहीं ।
उनकी यह बात भी हमको बहुत उत्तम लगती है।
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अब चलते हैं अपनी संस्कृति और सभ्यता की ओर :-

जिस देश की जो मूल भाषा होती है वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति में उस भाषा के प्रत्येक शब्द के आशय अथवा अर्थ का तत्व विद्यमान होता है, चाहे वह भले ही कम पढ़ा लिखा अथवा अनपढ़ हो।
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जैसे हमारी हिन्दी के एक शब्द "रोचक" को ही ले लीजिये । इसका आशय क्या है? यह सभी हिंदी भाषियों को बिना बताये स्पष्ट हो जाता है इसमें संदेह नहीं किया जा सकता।
फ़िलहाल मुख्य विषय की चर्चा ज्यादा उचित होगी।
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ऐसी स्थिति में मैं समझता हूँ कि कोंग्रेस जो बदलाव भूल गयी थी, भारत को आजादी के बाद जो एक नया रूप देना भूल गयी थी, उसे श्री मोदी जी को करना चाहिए और इस प्रकार के छिपे बहुत से तत्वों पर विचार भी करना चाहिए। हमारा ऐसा मत है कि इससे भारत की सामाजिक स्थिति में काफी कुछ सुधार हो सकता है।
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हमारे यहाँ न्यायालय को कभी कोर्ट नहीं कहना चाहिए, क्योंकि इससे शिक्षा के क्षेत्र में जो आम व्यक्ति हैं उनको इसका आशय सपष्ट नहीं हो पाता।
हमारे यहाँ न्यायधीश अथवा दंडनायक को अभी तक भी जज कहा जाता है, इससे जज के शिक्षित होने की वजह से भले ही वह अपनी पदवी का आशय समझता हो परन्तु और व्यक्तियों के लिए इसका आशय स्पष्ट नहीं होता।
न्यायधीश को आर्डर-आर्डर की जगह उचित शब्द को प्रयोग में लाना चाहिए, जिससे लोग डर के मारे नहीं अपितु उनका कथन सुनके और उसका आशय समझके सावधान हों।
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हमारे यहाँ पुलिस को पुलिस नहीं अपितु रक्षक घोषित होना चाहिए, जिससे पुलिस को भी यह ज्ञात हो सके कि वे आरक्षी हैं, और जनता में भी उनसे डर के जगह लगाव उत्पन्न हो सके।
उनके कार्यालय अथवा गृह को कदापि पुलिस स्टेशन नहीं लिखना चाहिए अपितु उचित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
अब लेख बहुत बड़ा हो रहा है अतः यहीं विराम देते हैं।
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!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!
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आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्या।

गुरुवार, 19 जून 2014

श्री मोदी जी की अगुआई में गृहमंत्रालय ने सभी को अपने कारोबार हिन्दी में करने का दिया निर्देश

अब गृह मंत्रालय ने मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को हिन्दी में सभी कारोबार करने के निर्देश दिए हैं।

कितना अच्छा लग रहा है यह जानकर !
आपको कैसा लग रहा है, हम यह तो नहीं बता सकते लेकिन हमें बहुत ही सुखद अनुभूति हो रही है।

मोदी जी का नारा "सबका साथ सबका विकास" सार्थक हो रहा है। अब सामान्य जन भी मंत्रिमंडल के नीतियों रणनीतियों से सीधे परिचित हो पाएंगे, निति और नियत दोनों ही परख पाएंगे।

और साथ में हिंदुस्तानी होने के नाते हिन्दी का वर्चस्व बनाये रखने अथवा खोया हुआ सम्मान दिलाने के लिए आगे आना प्रत्येक भारतीय का धर्म भी हो जाता है।
!!*!! जय हिन्द !!*!!

बुधवार, 18 जून 2014

खूब बढ़ा है हमारा शिक्षा स्तर

आज के इस युग लगभग 90% युवा साक्षर हैं, लोग कह रहे हैं शिक्षा का स्तर बढ़ गया है।

लेकिन क्या सचमुच बढ़ गया है ?

अरे शिक्षा स्तर के निर्माताओं आप ये क्यूँ नहीं कहते कि कुशिक्षा का स्तर बढ़ा है। आज स्कूलों में विज्ञान की शक्त पढाई होती है, गणित की सक्त पढाई होती है, अंग्रेजी की शक्त पढाई होती है।
लेकिन नैतिक शिक्षा ?????
इसका तो जैसे कोई महत्व ही नहीं रहा। कहने को तो सभी स्कूल और विद्यालय भारतीय हैं ! लेकिन वहाँ पर नैतिक शिक्षा जैसे विषय को मानों लकवा मार गया हो।

आखिर कोई क्यों पढ़ेगा नैतिक शिक्षा उसकी डिग्री किसी नौकरी के लिए आवश्यक भी तो नहीं है। अगर कोई आज के युवकों से नैतिक शिक्षा के विषय के बारे में पूँछ ले तो शायद कितने ऐसे होंगे जिनको ये बहुत नया लगेगा ! वे तो यही कहेंगे कि यह क्या है ?

और यदि विषय दिए भी जाते हैं तो उस पर पढाई नहीं होती और ऐसे विषयों के लिए कोई कड़ाई नहीं होती, बस पुस्तकों की सूची में सिर्फ नाम दर्ज करवा दिया जाता है।

आखिर हमें नीतियों की जरूरत भी कहाँ है जो की आने वाली पीढ़ियों को बताया जाय सिखाया जाय !
हमें तो इन नीतियों का गुलाम बना के इनका पालन करवा दिया जायेगा।
चौरस्ते पर सिग्नल होगा तो दुर्घटना नहीं होगी, वहाँ एक हबलदार होगा जो न जानने वाले को दंड देकर अर्थात कुछ खजाना लेकर हमें नीतियों से परिचित कराएगा।
चप्पे चप्पे पर पुलिस चौकी होगी, जो अपराधियों को दंड देकर यह बताएगी कि क्या करना चाहिए क्या नहीं।
सब जगह अदालत होगी जो अपराधी और निरपराधी का निर्णय करेगी।

क्या हमारे बच्चों में सदविचार, प्रेरणा और बौद्धिक क्षमता के बिना ये सब बनाये गए जाल काफी हैं, क्या बिना बुद्धि के विद्याओं अथवा बल का सदुपयोग हो सकता है ?

कदापि नहीं !

लोग गणित अंग्रेजी और विज्ञान में सौ नहीं लाखों अंक प्राप्त कर लें ! लेकिन बिना नैतिक शिक्षा में सौ अंक प्राप्त किये, ये दुर्घटनाएँ, ये अपराध और बलात्कार जैसा घिनौना अपराध थमने वाला नहीं।

आपका शुभचिन्तक___ अंगिरा प्रसाद मौर्या

!!*!! वन्दे-मातरम् !!*!!

शुक्रवार, 23 मई 2014

जय हिन्द, जय हिंदुत्व

सादर नमन ! स्वजनों !
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आजकल बहुत से लोग इस बात को लेकर चिंतित और बहुत विरोध में हैं, खासकर के कोंग्रेसी बहुत विरोध और आरोप लगा रहें हैं कि, "श्री मोदी जी ने शपथ ग्रहण के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को न्योता क्यों दिया।
"""""""
दुख की बात तो यह है की श्री नरेंदर मोदी जी को समझने का प्रयास कोई नहीं कर रहा है और अपनी मानसिकता खोये जा रहे हैं।
"
आरोपियों और विरोधियों को भी यह भलीभांति मालूम है कि श्री मोदी जी माननीय श्री अटल जी के पदचिन्हों पर चल रहे हैं, और उससे भी पहले वे भगवान श्री राम के बताये गये मार्गों एवं आदेशों का पालन कर रहें हैं।
"
इसमें से रामायण पूरा न सही तो थोड़ा बहुत सभी को मालूम होगा अथवा सीरियल पर देखे होंगे।

सबको यह ज्ञात होगा,
"
रावण जब खुद ही यज्ञ करावे,
है कौन जो भंग करन को आवे।
~~~~~~~~~APM
अर्थात:- लंका पर चढ़ाई करने हेतु मार्ग बनाते समय भगवान श्री राम ने स्वयं लंकापति रावण को महापंडित एवं महाविद्वान की उपाधि देकर पूजा संपन्न करने को बुलवाया था।
अब,
     जब स्वयं लंकापति ही पूजा को संपन्न कराएगा, तो ऐसी किसकी हस्ती है जो पूजा भंग कराएगा।
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अब हमने बहुत कुछ खंडन कर दिया, अब आप बुद्धिजीवी स्वयं हमारा आशय समझने की कृपा करें/-
क्योंकि हम किसी पर बिना सुबूत के आरोप लगाकर आरोपी नहीं बनना चाहते।
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आपका शुभचिन्तक___अंगिरा प्रसाद मौर्या।
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          !!*!!जय हिन्द!!*!!
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