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सोमवार, 5 जनवरी 2015

-: मुस्लिम भारत कब आये :-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
कृष्णम् वन्दे जगतगुरुम

भारत में मुस्लिमों के आने की घटना उस समय की है जब भगवान श्री कृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए थे।

अवैसी फेंकू है उसे क्या मालूम सनातन इतिहास ! उसका इतिहास तो हजरत मुहम्मद ने लगभग 1750 वर्ष पहले लिखा ।

जबकि यह घटना 5000 वर्ष पहले की है।
जरासंध नाम का एक राजा जो कि दानवी प्रवृत्ति का था, महाभारत से पहले ही श्री कृष्ण और बलिराम से 18 बार पराजित हुआ था।

अब वह श्री कृष्ण से युद्ध करने में सक्षम नहीं था, वह दिन रात युद्ध को लेकर चिंतित रहता था।
एक दिन मामा शल्य और उसकी मंत्रिणा इसी पर चल रही थी। शल्य ने जरासंध से कालयवन के बारे में बताया, और उसे युद्ध में शामिल होने के लिए न्योता भेजने को कहा।

कालयवन कौन था ? यह बहुत ही महत्व्पूर्ण है !

मलेक्ष देश यथा यमन, सऊदी अरबिया इत्यादि का एक बादशाह था जो बहुत ही पराक्रमी था। उसका साम्राज्य बहुत दूर दूर तक फैला था किन्तु उसके कोई संतान नहीं था।

बादशाह संतान के लिए बहुत चिंतित था। एक दिन उसका मंत्री बादशाह को एक बहुत बड़े फकीर के पास ले गया। फ़क़ीर ने बादशाह को महर्षि शिशिरायन के बारे में बताया।
महर्षि शशिरायन की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके पुत्र को देवों तथा दैविक-शक्तियों से पराजित न होने का वरदान दिया था।
फ़क़ीर ने कहा कि मुनि सिशिरायन का पुत्र ही इस साम्राज्य का राजा होगा चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। अतः तुम मुनि जी के पास जाओ और उनके पुत्र के लिए निवेदन करो। फ़क़ीर ने मुनि शिसिरायन का पता भी बता दिया।

बादशाह मुनि जी के पास आया और उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद लिया।
मुनि जी ने पूंछा कैसे आना हुआ ?
बादशाह ने अपनी व्यथा बताते हुए उनसे पुत्र देने का आग्रह किया ।
मुनि आग बबूला हो उठे और उन्होंने नकार दिया।

फिर बादशाह ने फ़क़ीर और उनके पुत्र को प्राप्त वरदान के बारे में बताया।
मुनि जी चकित हो गए ! क्योंकि वरदान के विषय में भगवान और उनके बाद दूसरा कोई नहीं जानता था।
मुनि जी पुलकित हो उठे और उन्होंने कहा कि वे फ़क़ीर कोई असाधारण मनुष्य ही हैं। अतः जब उनकी आज्ञा से आये हो तो हमारे पुत्र को ले जाओ।

बादशाह ने मुनि के पुत्र को गोद लिया। प्राचीन यवन और आधुनिक यमन उसकी राजधानी थी। इसलिए उसका नाम कालयवन पड़ा। उससे युद्ध करने को कोई भी तैयार नहीं होता था स्वयं आत्मसमर्पण कर देते थे सब।

कालयवन का इतिहास सुनकर जरासंध प्रसन्नता के मारे झूम उठा और उसने कालयवन को पत्र लिखा।
पत्र लेकर स्वयं शल्य ही यमन गए और उसी दिन कालयवन भी सहमत हो गया तथा आने का दिनाँक भी निर्धारित कर दिया।

उस समय मामा कंश को मारकर भगवान श्री कृष्ण मथुरा में ही रह रहे थे। इसबार जरासंध ने मथुरा को चारो ओर से घेर लिया। मुख्य द्वार पर कालयवन ने अपनी मुस्लिम सेना लिए पहली ललकार लगायी!

इस बार श्री कृष्ण, नगर द्वार से अकेले बाहर आये।
भगवान श्री कृष्ण को कालयवन के बारे में सब ज्ञात था। अतः उन्हें भगवान शिव के वचनों का मान रखना था। श्री कृष्ण ने कालयवन से कहा कि हमने जरासंध के कई करोड़ सेनानियों को मार दिया है, अब हम चाहते हैं कि हम और तुम द्वन्द युद्ध करते हैं जिससे सेनाओं को कोई हानि नहीं होगी।

कालयवन अति प्रसन्न हुआ और कहा मैं सहमत हूँ ! ये द्वन्द युद्ध कहाँ होगा ?

श्री कृष्ण ने कहा, " यह युद्ध वहाँ होगा जहाँ केवल हम और तुम प्रतिद्वंदी और समय निर्णायक हो तथा चौथा कोई नहीं होगा।

अब आगे आगे श्री कृष्ण चल पड़े और उनके पीछे कालयवन। बहुत दूर चलते चले गए तब कालयवन ने कहा कि अब यहाँ कोई नहीं है यही युद्ध होगा।

श्री कृष्ण भी मान गए। किन्तु उन्हें युद्ध करना नहीं था इसलिए वे भागने लगे और कालयवन दौड़ाने लगा। इसी कारण भगवान श्री कृष्ण का नाम रणछोड़ भी पड़ गया।

श्री कृष्ण भागते भागते उस गुफा में पहुँचे जहाँ देवासुर संग्राम से थके इक्ष्वाकु वंस(दशरथ और श्रीराम के पुर्वज) के राजा मुचकुन्द निद्रा में थे। चक्रवर्ती राजा मुचकुन्द को इंद्र से वरदान प्राप्त था कि जो उनकी निद्रा भंग करेगा उसपर उनकी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जायेगा।

भगवान श्री कृष्ण अपनी भगवा चद्दर से मुचकुन्द को ढक दिए। और स्वयं छुप गए। इतने में कालयवन ने आकर मुचकुन्द की निद्रा भंग कर दी और वह जलकर भस्म हो गया।

कालयवन की कुछ सेनाएँ भारत में रह गयीं और कुछ यमन चले गए। तभी से ही भारत में तथा इर्द-गिर्द मुसलमान रहने लगे और रिस्तेदारी तथा नातेदारी यमन तक होने लगी।

(नालंदा विश्व-विद्यालय जल जाने के बाद ये सारा इतिहास भी पर्दे में चला गया है किन्तु अवशेष आपको अभी भी मिलेंगे यदि अध्ययन करो )

वन्दे-मातरम्
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सोमवार, 11 अगस्त 2014

दुष्कर्म ! आखिर क्या करे अब नारी !


पीड़ित हैं जो दुष्कर्मों से,
जाके पूँछो उन मर्मों से,
हमें वहीं तक ज्ञात हुआ है,
तदाकार हूँ जिन शर्मों से।

जग में इसकी रही लड़ाई,
फिर भी जग ने खूब उड़ाई,
वह भी तो पीड़ित होता है,
जिसने भी यह जनक बढाई।

नारी पर दुष्कर्म हुआ है,
नहीं पता खुदकर्म हुआ है,
राय यहाँ मैं भी कहता हूँ,
जिनसे पलड़ा नर्म हुआ।

वस्त्र बहुत हैं बाजारों में,
वेश्या के कुछ आचारों में,
तुमको चयन वही करना है,
सुखदायक हो संसारों में।

श्रमिकों का तुम संघ बनो अब,
धनिकों में एक अंग बनो अब,
महाशक्ति को तुम दर्शा दो,
अंग प्रतिष्ठा बंद करो अब।

वात्सल्य है तेरे कारण,
वीरोचित भी तू नर्मों से,
हमें वहीं तक ज्ञात हुआ है,
परिचित हूँ मैं जिन शर्मों से।

आधा जग ये तेरा नारी
फिर भी हो तुम क्यूँ दुखियारी,
एकत्रित अब हो जाओ तुम,
जैसी कलियाँ वैसी क्यारी।

मानसून तुम भी लहराओ,
चरण-पादुका हो बिसराओ,
तुम भी हो बलवान यहाँ पर,
चित्त को अपने अभी बताओ।

माना सबकुछ काटे आरी,
नित जो कटे न उसको भारी,
तुम भी हो जगदम्ब स्वरूपा,
अंग-मात्र की ना बलिहारी।

नीतिपरक अब तुम हो जाओ,
हो परिभाषित अब कर्मों से,
"मौर्य" वहीं तक ज्ञात हुआ है,
परिचित हूँ मैं जिन शर्मों से।
०९/०८/२०१४
     ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।
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शब्दार्थ:-

मर्म= हृदय, मन, चित्त।
तदाकार= सम्बंधित, परिचित।
जनक= गूढ़, समूह, संख्या।
पलड़ा= वर्ग।
वेश्या= नीति को कुचलने वाला।
आचार= व्योहार, निर्धारित नीति ।
श्रमिक= संघर्षी, तपस्वी।
वात्सल्य= ममता भाव,
नर्म= कोमल, विनम्र, तन्मय।
मानसून= आशायुक्त प्रवृत्ति,उत्तेजना ।
चरण-पादुका= पैरों की धूल, चप्पल।
आरी = जो प्रत्येक का भेदन कर सकती है।
बलिहारी= मान-प्रतिष्ठा का कारक अथवा कारण
नीतिपरक= सीमित आचार ।
परिभाषित= शिद्ध, सत्य का साक्षी।
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-: कुछ पंक्तियों की समीक्षा :-

वेश्या के कुछ आचारों में :-
यथा आज के चित्र जगत अथवा अभिनय शतक में आकर्षण का कारक, ।
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सुखदायक हो संसारों में:-
हमारा संसार एक होते हुए भी इसके विभिन्न विभाग हैं, यथा- मेला, उत्सव का सामूहिक हर्षोल्लास, कार्यालय समूह, विद्यालय इत्यादि।
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नित जो कटे न उसको भारी:-
आपकी कोई गोपनीय शक्ति है जो बहुत ही प्रबल है । किन्तु यदि उसका उपयोग बार बार अथवा सर्वदा किया जाय तो उसका महत्व नष्ट हो जाता है। उसका उपाय सभी ढूढ़ चुके होते हैं।
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-: दुष्कर्म :-
जो कर्म बलवान होने के नाते किया जाता हो, और नीति अथवा सिद्धांतो के परे हो उसे दुष्कर्म कहा जाता है।
जैसे :- परुष प्रधान समाज में नारियों का अपमान, कंस द्वारा अपने पिता उग्रसेन को बंदी बना कारागार में डालना, स्वार्थ हेतु पिता द्वारा असहाय पुत्र अथवा पुत्री की हत्या कर देना इत्यादि।
" जो राजा अपने इच्छा के विरुद्ध और कोई नियम नहीं जनता वह मिथ्यावादी, दुराचारी अथवा दुष्कर्मी है"

Your well wisher -  Angira Prasad Maurya.

!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

गुरुवार, 19 जून 2014

भीड़ का हिस्सा ! क्या आम आदमी वास्तव में कोई परिवर्तन ला सकता है? या बस करता रहेगा आरोप प्रत्यारोप? 

-:भीड़:-

भीड़ तो कई प्रकार की होती है, कुछ जुटाई जाती हैं, कुछ बुलाई जाती हैं और कुछ खुद चल के आती हैं।

अब इनमे जो खुद चल के आती हैं उन्ही में हिस्सा(भीड़ का हिस्सा) हो सकता है। क्योंकि उसमे से प्रत्येक अपने अपने मतानुसार एकत्रित होते हैं। वे किसी एक विशेष प्रयोजन से नहीं होते।
जैसे- शादी की भीड़, सब शादी के प्रयोजन से ही होते हैं।

फिल्मों की भीड़, यहाँ सब फिल्मों के प्रयोजन से ही होते हैं।

चुनाव प्रचार हेतु अथवा सत्संग हेतु बुलायी गयी भीड़, यहाँ सब सुनने और सीखने के प्रयोजन से होते हैं।
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दुनियाँ की भीड़:-

यह एक बहुत बड़ी भीड़ है। यहाँ न तो कोई बुलाया गया है न तो कोई लाया गया है, सब के सब खुद अपनी जगह पर रहते हुए इस भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। इसी भीड़ में मैं भी हूँ और आप भी हैं। अर्थात प्रत्येक इस भीड़ का हिस्सा है। और सबके अपने-अपने स्थान हैं।
इसी में एक बहुत बड़ा स्थान आम आदमी का भी है।

क्या कर सकता है आम आदमी:-

हमारा मत है की आम आदमी कुछ नहीं कर सकता। वह जो कुछ भी करता है सब अपने लिए ही करता है, और अपने लिए करना कुछ न करने के बराबर है।
जैसे- एक परिवार में मुखिया को छोड़ सभी आम आदमी हैं, सब अपने लिए करते हैं किन्तु मुखिया/अभिभावक होने के नाते मुखिया सब के लिए सोचता करता है। यहाँ पर आज के समय में एक ही परिवार से कई लोग वहन/खर्च को लेकर अपनी अपनी जिम्मेदारियों पर कार्यरत हो सकते हैं, तो वे सब भी वहाँ पर आम आदमी नहीं हुए। सामूहिक मुखिया के रूप में उनका अपना-अपना स्थान होता है। बचे हुए बाकी आम आदमी।

अब बात आती है दुनियाँ के भीड़ की, देश के भीड़ की।
यहाँ पर भी जो सिर्फ अपने परिवार के लिए करता है वह भी कुछ नहीं करता है, वही है आम आदमी।
जिसे यह ज्ञात होता है कि हम केवल परिवार से नहीं अपितु समाज एवं देश से भी हैं तो वह अपने परिवार में ही देशहित हेतु प्रेरणाएँ देता है, देश पर मर-मिटने हेतु हौंसले बुलंद करता है, समाज को साफ़ सुथरा रखने हेतु कड़े कदम उठता है।  वह आम आदमी नहीं होता, वह खास आदमी होता है।

किसी घटनास्थल पर एकत्रित आम आदमी की पूरी की पूरी भीड़ भी कुछ नहीं कर सकती जब तक वहाँ कोई खास आदमी नहीं होगा ।

आम आदमी कुछ नहीं कर सकता,परन्तु आम आदमियों का समूह बहुत कुछ कर सकता है।
जरूरत है नेतृत्व की, और नेतृत्व एक खास आदमी ही कर सकता है। जरूरत है दयानंद की, जरूरत है विवेकानंद की, जरूरत सुभाष की ।

ऐसे कृत्य करने वाले नाम तो बहुत हैं, किन्तु हमने सार्थक नामों को ही दिया।

दयानंद= दया करने में ही जिन्हें आनंद मिलता हो।
विवेकानंद= विवेक ही जिनका आनंद हो, अर्थात कर्तव्य पथ से कभी न हटने वाला।
सुभाष = जिनसे सुभ की ही प्रत्येक को आशा हो।
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आरोप प्रत्यारोप :-

आम आदमी के आरोप-प्रत्यारोप से कुछ नहीं होने वाला, जब तक कि वह अपने आप को खास आदमी नहीं बना लेता, एक व्यापक समूह नहीं तैयार कर लेता। झूठी झलक में पद्स्थित इन सत्ता के अधिकारियों को, नेतृत्वहीनों को और नेत्रहीनों को जब तक सत्ताविहीन नहीं कर देता।
हमारा यह लेख यहीं पूरा हुआ।
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अब यदि कोई कहे कि मोदी जी को आम आदमी ने जिताया तो यह गलत है। मोदी जी को उनके नेतृत्व ने जिताया। मोदी जी को उनके व्यापक समूह ने जिताया। मोदी जी में बैठे सुभाष, गुजरात के विकास ने जिताया।

मंगलवार, 10 जून 2014

जब तक जीवित हैं सुभाष

विश्व में भारत नहीं निराश
जब तक जीवित हैं सुभाष

फौजों का निश्चित विकाश
युवाओं में सदा प्रयास
अखिल विश्व में बड़ा प्रकाश
जब तक जीवित हैं सुभाष

नहीं गुलामी है बर्दाश
हिन्द श्रेष्ठ है पर्दाफास
झुक जाएँ हम ये बकवास
जब तक जीवित हैं सुभाष

नहीं किसी में इतनी हिम्मत
करे हमारी गणना सम्मत
अनोखा अपना है लिबास
जब तक जीवित हैं सुभाष

"मौर्य" अदा क्या कर्ज करेंगे
फिर भी अपना फर्ज करेंगे
हम जहाँ गिरेंगे महाँ विनाश
जब तक जीवित हैं सुभाष।
_____जय हिन्द_____
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक- १०/०६/२०१४